जहाँ बादल ऋषियों की तरह ध्यान करते हैं

 


बिनसर : हिमालय की आँखों में झाँकता एक स्वप्न

हिमालय के विस्तृत वक्ष पर, देवदारों और बाँज के वृक्षों की छाया में, एक ऐसा लोक बसा है जहाँ समय घड़ी की सुइयों से नहीं, पत्तियों की सरसराहट और पक्षियों के कलरव से मापा जाता है। उसका नाम है — बिनसर वन्यजीव अभयारण्य

बिनसर कोई स्थान नहीं, एक अनुभूति है; कोई गंतव्य नहीं, एक आंतरिक यात्रा है। यहाँ पहुँचकर लगता है मानो पृथ्वी ने अपने सबसे सुंदर स्वप्न को पर्वतों की गोद में सहेजकर रख छोड़ा हो।

प्रभात की पहली किरण जब दूर क्षितिज पर हिमालय की हिमाच्छादित चोटियों को स्पर्श करती है, तब नंदा देवी के माथे पर स्वर्ण का तिलक चमक उठता है। त्रिशूल की श्वेत भुजाएँ आकाश को आलिंगन करती प्रतीत होती हैं और पंचाचूली की चोटियाँ किसी प्राचीन महाकाव्य के अमर श्लोकों की तरह क्षितिज पर अंकित दिखाई देती हैं।

उस क्षण लगता है जैसे सूर्य नहीं उगा, बल्कि स्वयं सृष्टि ने अपनी आँखें खोली हों।


जंगलों का मौन संगीत

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बिनसर के जंगलों में प्रवेश करना किसी हरित मंदिर में प्रवेश करने जैसा है। देवदारों के ऊँचे स्तंभ, बाँज के वृक्षों की गंभीरता और बुरांश के फूलों की लालिमा मिलकर प्रकृति का ऐसा प्रांगण रचते हैं जहाँ हवा भी धीमे स्वर में बोलती है।

यहाँ पगडंडियाँ कहीं नहीं जातीं—वे भीतर उतरती हैं।

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किसी मोड़ पर धूप पत्तों के बीच छनकर भूमि पर उतरती है और लगता है जैसे वनदेवी ने स्वर्णिम चादर बिछा दी हो। कहीं कोई पक्षी अनजानी धुन छेड़ता है, कहीं बादल शाखाओं पर झुककर विश्राम करते हैं। जंगल का प्रत्येक वृक्ष एक ऋषि है और प्रत्येक हवा का झोंका किसी प्राचीन उपनिषद् का श्लोक।


ज़ीरो पॉइंट : जहाँ आकाश पृथ्वी का हाथ थाम लेता है



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बिनसर का ज़ीरो पॉइंट केवल एक दृश्य बिंदु नहीं, दृष्टि का विस्तार है।

यहाँ खड़े होकर जब दृष्टि दूर-दूर तक फैली हिमालयी श्रेणियों पर दौड़ती है, तब मनुष्य अपने छोटेपन और प्रकृति की विराटता दोनों को एक साथ अनुभव करता है। नीचे बादलों का समुद्र लहराता है और ऊपर नीला आकाश अनंत का आभास देता है।

ऐसा प्रतीत होता है जैसे धरती और आकाश ने यहीं कहीं एक-दूसरे का हाथ थाम रखा हो।


इतिहास की धीमी प्रतिध्वनियाँ

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कभी कुमाऊँ के राजाओं की ग्रीष्मकालीन राजधानी रहा बिनसर आज भी अपने भीतर इतिहास की अनेक प्रतिध्वनियाँ सँजोए हुए है। पुरातन मंदिरों की घंटियाँ, पहाड़ी लोकगीतों की धुनें और सदियों पुराने वृक्षों की छाया मिलकर एक ऐसा वातावरण रचती हैं जहाँ अतीत और वर्तमान एक-दूसरे में घुल जाते हैं।

यहाँ की निस्तब्धता शून्य नहीं है; वह समय के हजारों वर्षों से भरी हुई है।


बिनसर : एक स्मृति जो लौट-लौट कर आती है

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यात्राएँ प्रायः समाप्त हो जाती हैं, पर बिनसर समाप्त नहीं होता।

वह लौटते समय आपके सामान में नहीं, आपकी स्मृतियों में साथ चलता है। किसी सुबह की धूप में, किसी पुस्तक के पन्ने पर, किसी कविता की पंक्ति में या किसी एकाकी क्षण में अचानक फिर से उपस्थित हो जाता है—देवदारों की सुगंध, हिमालय की उजली चोटियाँ और बादलों की धीमी चाल लेकर।

बिनसर दरअसल हिमालय का वह मौन गीत है जिसे सुनने के लिए कानों की नहीं, हृदय की आवश्यकता होती है।

और जो एक बार इस गीत को सुन लेता है, उसके भीतर जीवन भर पर्वतों की प्रतिध्वनि गूँजती रहती है।



"बिनसर में पर्वत दिखाई नहीं देते, वे धीरे-धीरे आपकी आत्मा में उतरते हैं।"

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