हिमालय की नीरवता में गूँजती प्रार्थनाएँ

 



बर्फ, बादलों और प्रार्थनाओं के बीच

हिमालय के विशाल वक्षस्थल पर, जहाँ आकाश अपनी नीली चादर उतारकर बर्फ से ढकी चोटियों पर बिछा देता है, वहीं कहीं जन्म लेती है यमुना। एक पतली-सी जलधारा के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय चेतना में बहने वाली उस सनातन स्मृति के रूप में, जिसे युगों से लोग माँ कहकर पुकारते आए हैं।

कालिंद पर्वत की हिमगर्भा से निकलने के कारण वह कालिंदी कहलाती हैं। पुराणों ने उन्हें सूर्य की पुत्री कहा, लोक ने उन्हें बहन, बेटी और माँ के रूप में अपनाया। उनके उद्गम की ओर बढ़ना किसी तीर्थ तक पहुँचने का प्रयास मात्र नहीं, बल्कि अपने भीतर सोई हुई श्रद्धा को जगाने की यात्रा है।


वह पथ जहाँ पर्वत बोलते हैं



जानकी चट्टी से आगे बढ़ते ही संसार पीछे छूटने लगता है।

पगडंडी पहाड़ों की देह से लिपटी हुई ऊपर उठती जाती है। कहीं झरने चट्टानों पर वीणा के तारों की तरह झंकृत होते हैं, तो कहीं देवदारों के सघन वन अपनी शीतल छाया में यात्रियों का मौन स्वागत करते हैं।

बादल कभी राहगीरों के साथी बन जाते हैं, कभी शरारती बालकों की तरह सामने खड़े पर्वतों को छिपा लेते हैं।

रास्ते भर सुनाई देता है—

“जय माँ यमुना!”

यह उद्घोष केवल ध्वनि नहीं, बल्कि उन लाखों कदमों की थकान का संबल है जो सदियों से इसी मार्ग पर चलकर यहाँ पहुँचे हैं।

हर मोड़ पर लगता है जैसे हिमालय कोई नया रहस्य खोलने वाला हो।


जहाँ अग्नि और हिम एक-दूसरे का हाथ थामते हैं



यमुनोत्री पहुँचते ही प्रकृति का एक अद्भुत चमत्कार आँखों के सामने साकार हो उठता है।

एक ओर नवजात यमुना बर्फीली साँसों के साथ चट्टानों से टकराती हुई बहती है, दूसरी ओर सूर्यकुंड का उबलता जल पृथ्वी की गहराइयों में छिपी अग्नि का परिचय देता है।

हिम और अग्नि का यह संगम मानो सृष्टि के आदि रहस्य का संकेत हो।

श्रद्धालु कपड़े की छोटी पोटलियों में चावल बाँधकर उबलते जल में डुबोते हैं। कुछ ही क्षणों में वह प्रसाद बन जाता है। ऐसा लगता है जैसे प्रकृति स्वयं अपनी रसोई में भक्तों के लिए आशीर्वाद पका रही हो।

तप्तकुंड का स्पर्श शरीर की थकान को वैसे ही बहा ले जाता है जैसे नदी किनारे की रेत पर बने पदचिह्नों को।


संध्या : जब प्रकाश प्रार्थना बन जाता है



दिनभर धुंध और पर्वतों के बीच छिपा रहने वाला यमुनोत्री धाम संध्या के समय किसी स्वप्नलोक की तरह उज्ज्वल हो उठता है।

धीरे-धीरे अंधकार घाटी में उतरता है और उसी के साथ मंदिर के दीप प्रज्ज्वलित होने लगते हैं।

घंटियों की ध्वनि हवा में घुलती है।

मंत्रों का स्वर पर्वतों से टकराकर लौटता है।

दीपों की स्वर्णिम आभा यमुना की जलराशि पर थिरकती है।

उस क्षण लगता है जैसे नदी बह नहीं रही, बल्कि प्रार्थना कर रही हो।

श्रद्धालुओं की आँखों में दीपों का प्रकाश और मन में असीम शांति एक साथ उतर आती है।


स्मृतियों में बहती हुई यमुना

यात्राएँ प्रायः समाप्त हो जाती हैं, पर यमुनोत्री समाप्त नहीं होती।

वापसी के बाद भी देवदारों की सुगंध स्मृति में बनी रहती है।

बादलों में खोई चोटियाँ बार-बार आँखों के सामने उतर आती हैं।

संध्या आरती की लौ और यमुना की कल-कल ध्वनि मन के किसी शांत कोने में निरंतर गूँजती रहती है।

शायद इसी कारण यमुनोत्री कोई स्थान नहीं, एक अनुभूति है।

एक ऐसी अनुभूति, जो हिमालय की ऊँचाइयों से उतरकर मनुष्य के भीतर बहने लगती है—यमुना की तरह, निर्मल, अविरल और शाश्वत।



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