जहाँ इतिहास और मिथक एक-दूसरे में विलीन हो जाते हैं
"जहाँ हर पत्थर किसी प्राचीन मंत्र की प्रतिध्वनि बनकर बोलता है।"
उत्तराखंड के जौनसार-बावर अंचल की शांत वादियों में, धुंध से लिपटे हिमालयी पर्वतों की गोद में एक ऐसा स्थल छिपा है, जहाँ समय की गति मानो धीमी पड़ जाती है। यह है लाखामंडल—एक ऐसा रहस्यमय तीर्थ जहाँ इतिहास, पुराण और लोकविश्वास एक-दूसरे में इस प्रकार घुल-मिल जाते हैं कि उनके बीच की सीमाएँ धुंधली हो जाती हैं।
पहली दृष्टि में यह स्थान एक प्राचीन मंदिर परिसर प्रतीत होता है, किन्तु जैसे-जैसे आप इसके निकट पहुँचते हैं, आपको एहसास होता है कि यह केवल पत्थरों का समूह नहीं, बल्कि सदियों की स्मृतियों, कथाओं और आध्यात्मिक ऊर्जा का जीवंत संग्रहालय है।
'लाखामंडल'—नाम अपने भीतर ही एक कथा समेटे हुए है।
उत्तराखंड के जौनसार-बावर क्षेत्र में, यमुना घाटी की शांत पहाड़ियों और हिमालय की विराट छाया के बीच एक ऐसा स्थान स्थित है, जहाँ पहुँचकर लगता है कि समय ने अपनी गति धीमी कर दी है।
यह है लाखामंडल।
पहली दृष्टि में यह एक प्राचीन मंदिर परिसर दिखाई देता है, लेकिन कुछ देर रुकते ही एहसास होता है कि यह केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की उन परतों का संग्रह है जहाँ इतिहास, लोककथा और आस्था एक-दूसरे में विलीन हो जाते हैं।
कहा जाता है कि 'लाखामंडल' नाम दो शब्दों से बना है—लाख और मंडल।
लोकमान्यता है कि कभी इस क्षेत्र में एक लाख शिवलिंग स्थापित थे। आज भी मंदिर परिसर और उसके आसपास बिखरे असंख्य शिलाखंड, प्रतिमाएँ और प्राचीन अवशेष उस गौरवशाली अतीत की मौन गवाही देते हैं।
पत्थरों में अंकित एक सभ्यता
लाखामंडल केवल धार्मिक महत्व का स्थल नहीं है।
यह एक जीवित पुरातात्विक संग्रहालय भी है।
मंदिर परिसर में बिखरे अलंकृत स्तंभ, नक्काशीदार आधारशिलाएँ, टूटी मूर्तियाँ और प्राचीन स्थापत्य अवशेष यह संकेत देते हैं कि कभी यह क्षेत्र हिमालयी संस्कृति और शैव परंपरा का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा होगा।
हर शिला पर समय की उँगलियों के निशान दिखाई देते हैं।
हर अवशेष किसी भूले हुए युग की कहानी कहता है।

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