लाखामंडल : हिमालय की घाटियों में छिपा हुआ समय का एक द्वार
कुछ स्थान मानचित्र पर दर्ज होते हैं।
कुछ इतिहास की पुस्तकों में।
और कुछ ऐसे भी होते हैं जो लोककथाओं, विश्वासों और अनुत्तरित प्रश्नों के बीच जीवित रहते हैं।
लाखामंडल उन्हीं दुर्लभ स्थानों में से एक है।
जौनसार-बावर की शांत पहाड़ियों में, जहाँ देवदार की सुगंध हवा में घुली रहती है और बादल अक्सर धरती पर उतर आते हैं, वहाँ सदियों से एक ऐसा तीर्थ मौन खड़ा है जिसने राजवंशों का उत्थान-पतन देखा है, यात्रियों के कदम सुने हैं और अनगिनत कथाओं को अपने भीतर संजो रखा है।
यहाँ पहुँचते ही लगता है मानो आधुनिक समय अचानक पीछे छूट गया हो।
सड़क समाप्त होती है, शोर समाप्त होता है और आरम्भ होती है पत्थरों की वह दुनिया, जहाँ हर आकृति किसी भूली हुई कथा का संकेत देती है।
पत्थरों का नगर
लाखामंडल का पहला प्रभाव किसी मंदिर से अधिक एक प्राचीन सभ्यता का अनुभव कराता है।
मंदिर परिसर में बिखरे असंख्य शिवलिंग, टूटी मूर्तियाँ, अलंकृत शिलाखंड और समय की मार झेलते स्थापत्य अवशेष यह आभास देते हैं कि कभी यह स्थान असाधारण रूप से समृद्ध धार्मिक केंद्र रहा होगा।
स्थानीय लोग बताते हैं कि यहाँ कभी इतने शिवलिंग थे कि उनकी संख्या गिनना असंभव था।
शायद इसी कारण इसका नाम लाखामंडल पड़ा।
लेकिन संख्या से अधिक महत्वपूर्ण वह भाव है जो यहाँ उपस्थित होता है।
यहाँ खड़े होकर लगता है कि पत्थर भी स्मृति रखते हैं।
इतिहास जहाँ किंवदंती बन जाता है
लाखामंडल का नाम आते ही महाभारत की एक रहस्यमय घटना स्मृति में कौंध जाती है।
कहा जाता है कि इसी क्षेत्र में कहीं वह लाक्षागृह था, जहाँ पांडवों को समाप्त करने का षड्यंत्र रचा गया था।
इतिहासकार इस पर बहस करते रहेंगे।
पुरातत्वविद् प्रमाण खोजते रहेंगे।
लेकिन स्थानीय जनमानस के लिए यह कोई प्रश्न नहीं है।
उनके लिए यह कथा आज भी जीवित है।
संध्या के समय जब पहाड़ों पर धुंध उतरती है और मंदिर परिसर लगभग सुनसान हो जाता है, तब यह विश्वास और भी गहरा प्रतीत होता है कि शायद इन घाटियों ने वास्तव में महाभारत का कोई अध्याय देखा होगा।
वह शिवलिंग जो आपको स्वयं से मिलवाता है
मंदिर के भीतर स्थित एक विशेष शिवलिंग के सामने पहुँचकर अधिकांश यात्री ठिठक जाते हैं।
जब उस पर जल चढ़ाया जाता है तो उसकी सतह अचानक चमक उठती है।
कुछ क्षणों के लिए वह दर्पण बन जाता है।
आप उसमें अपना चेहरा देख सकते हैं।
पर शायद यही उसका रहस्य नहीं है।
रहस्य यह है कि उस क्षण आप स्वयं को देखने लगते हैं।
हिमालय के बीच खड़े होकर, समय के इतने विशाल विस्तार के सामने, मनुष्य पहली बार अपनी क्षणभंगुरता को महसूस करता है।
धरती के भीतर उतरती हुई कथा
मुख्य मंदिर के पीछे की ओर बढ़ते ही एक संकरी राह आपको नीचे ले जाती है।
यहाँ कोई भव्य स्थापत्य नहीं।
कोई सुनहरी सजावट नहीं।
सिर्फ पत्थर, अंधकार और गहरी निस्तब्धता।
यही है वह प्राचीन गुफा, जिसे लोग पांडवों से जोड़ते हैं।
गुफा के भीतर प्रवेश करते ही तापमान बदल जाता है।
ध्वनियाँ बदल जाती हैं।
समय की अनुभूति भी बदल जाती है।
कुछ यात्रियों के लिए यह केवल एक पुरानी शैलगुफा है।
कुछ के लिए यह महाभारत का जीवित साक्ष्य।
और कुछ के लिए यह ध्यान का सबसे शांत कक्ष।
कार्तिकेय की स्मृति
स्थानीय परंपराएँ इस भूमि को एक और दिव्यता प्रदान करती हैं।मान्यता है कि देवसेनापति कार्तिकेय का संबंध भी इसी क्षेत्र से रहा है।
यही कारण है कि लाखामंडल में केवल शिव की उपस्थिति नहीं महसूस होती, बल्कि एक व्यापक दैवीय संसार का आभास होता है।
यहाँ मिथक किसी पुस्तक में नहीं रहते।
वे लोगों की बातचीत में, पर्वों में, लोकगीतों में और मंदिर की घंटियों में जीवित रहते हैं।
रास्ते भी गंतव्य होते हैं
लाखामंडल की सबसे सुंदर बात शायद स्वयं लाखामंडल नहीं है।
बल्कि वहाँ तक पहुँचने का सफर है।
घुमावदार सड़कें।
चीड़ और देवदार के जंगल।
पहाड़ियों पर बिखरे छोटे गाँव।
दूर बहती यमुना की धारा।
और अचानक किसी मोड़ पर खुल जाने वाला हिमालय का विराट दृश्य।
ऐसी यात्राएँ हमें केवल स्थानों तक नहीं ले जातीं।
वे हमें हमारी भागती हुई जिंदगी से बाहर निकालकर उस मौन से मिलवाती हैं, जिसे हम वर्षों से सुनना भूल चुके होते हैं।
लौटते समय
लाखामंडल से लौटते हुए आपके कैमरे में कुछ तस्वीरें होती हैं।
मोबाइल में कुछ वीडियो।
लेकिन सबसे मूल्यवान स्मृति वह होती है जिसे कोई उपकरण दर्ज नहीं कर सकता।
वह एहसास कि कहीं न कहीं, हिमालय की इन शांत घाटियों में, समय आज भी धीमी गति से बहता है।
और कुछ रहस्य ऐसे हैं जिन्हें सुलझाने के लिए नहीं, केवल महसूस करने के लिए बनाया गया है।
लाखामंडल उन्हीं रहस्यों में से एक है।
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